प.पू.रत्ननिधि श्री जी म.सा. आदि ठाणा के सानिध्य में हुआ कल्पवृक्ष का रोपण

धमतरिहा के गोठ
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संजय छाजेड़ 
धमतरी 14 अगस्त। धमतरी में अत्र विराजित साध्वी प.पू.रत्ननिधि श्री जी म.सा. आदि ठाणा के सानिध्य में शांति कालोनी स्थित अभिनंदन स्वामी जिनालय में 14 अगस्त को शुभ मुहुर्त में सुरेश छाजेड़ के दिशा निर्देश में केंद्र कल्प वृक्ष का रोपण किया गया। जैन धर्म के अनुसार कल्प वृक्ष का एक विशेष महत्व है। इसके बारे में काफी मान्यताएं भी हैं। बताया गया कि उक्त कल्प वृक्ष रांची से राजनांदगांव पश्चात धमतरी लाया गया। कल्पवृक्ष के बारे में जैन वास्तु के जानकार सुरेश छाजेड़ ने विस्तार से बताया कि कल्प वृक्ष को कल्प तरू के नाम से जाना जाता है। यह मनोवांछित चीजों को देने वाला है। जैन आगम में इसका वर्णन भी है। इस वृक्ष के नजदीक जाकर जो भी व्यक्ति अपनी मनोकामना प्रकट करता है, वह इच्छा पूरी होती है। पुराने समय में जब व्यक्ति के पास आधुनिक सुख सुविधाएं उपलब्ध नहीं थी, तब ऐसा बताया जाता है कि कोई भी व्यक्ति इस वृक्ष के नीचे बैठकर अगर भोजन की मांग करता था तो अपने आप उसे भोजन उपलब्ध हो जाता था। बसंतकाल में भगवान आदिनाथ के समय इस वृक्ष की उत्पत्ति स्वयं होती थी। आदिकाल में जब व्यक्ति में लोभ नहीं था तो उस समय किसी भी व्यक्ति की कामना इस वृक्ष के नीचे पूर्ण होती थी परंतु जैसे जैसे समय बीतता गया, व्यक्ति में लोभ उत्पन्न होने लगा और इस वृक्ष के नीचे आकर व्यक्ति अपने लोभ के चलते अनचाहे मांग करता रहा जिससे यह वृक्ष लुप्तप्राय हो गया। वर्तमान में पूरे भारत वर्ष में चार वृक्ष शेष बचे हैं। धमतरी श्री संघ को यह लाभ मिलना काफी गौरवशाली है।
कल्पवृक्ष के बारे में कुछ विशेष जानकारियां 
 कल्पवृक्ष हिन्दू, जैन और बौद्ध धर्म में हर इच्छा को पूरा करने वाला एक पवित्र और पौराणिक दिव्य वृक्ष है। समुद्र मंथन के दौरान प्रगट हुए चौदह रत्नों में से एक कल्पवृक्ष को माना जाता है, जिसे देवराज इंद्र अपने साथ स्वर्ग ले गए थे। इसे समृद्धि, सकारात्मक ऊर्जा और विकास का प्रतीक माना जाता है। 
पौराणिक और धार्मिक महत्व समुद्र मंथन
 पौराणिक कथाओं के अनुसार, यह वृक्ष समुद्र मंथन के समय निकला था। इच्छापूर्ती-मान्यता है कि इसके नीचे बैठकर जो भी कामना की जाए वह पूरी होती है। अन्य नाम-इसे कल्पतरु, कल्पद्रुम, सुरतरु और देवतरु भी कहा जाता है। वास्तविक जीवन में कल्पवृक्ष बाओबाब का पेड़ धार्मिक मान्यता के अलावा, वानस्पतिक रूप से एडोनिया डिजिटेटा यानी बाओबाब के पेड़ को कल्पवृक्ष माना जाता है। दुर्लभ पौधे-भारत में इसके कुछ ही प्राचीन और ऐतिहासिक पेड़ बचे हैं जैसे उत्तर प्रदेश के हमीरपुर, मध्य प्रदेश के ग्वालियर और बड़वानी में उक्त वृक्ष है। आयुर्वेदिक गुण-इसकी छाल, पत्तियां और फल औषधीय गुणों से भरपूर होते हैं। इनका उपयोग दमा, कब्ज और त्वचा से जुड़ी समस्याओं के उपचार में किया जाता है। पर्यावरण के लिए लाभ-यह पेड़ हवा के प्रदूषण को कम करता है और इसका तना बहुत मोटा और विशाल होता है।
 इस अवसर पर जैन श्वेतांबर मूर्ति संघ के अध्यक्ष विजय गोलछा, सुरेश गोलछा, लक्ष्मीचंद दुग्गड़, आशीष बरडिय़ा, किरोड़ी दुग्गड़, राकेश लोढा, सुनील दुग्गड़, संकेत पारख, ज्ञानचंद दुग्गड़, मनीष बरडिय़ा, धनपत बरडिय़ा, पूनमचंद गोलछा, अंकित बरडिय़ा सहित भारी संख्या में धर्मनिष्ठ सुश्रावक, श्राविकाएं उपस्थित थे।

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