संजय छाजेड़
खरतरगच्छाधिपति एवं खरतरगच्छ के 82 वें पट्टधर श्री जिन महोदयसागरसूरि जी म.सा.के सुशिष्य, खरतरगच्छाधिपति एवं खरतरगच्छ के 83 वें पट्टधर श्री जिन कैलाशसागरसूरि जी म.सा.के पाट पर विराजमान , खरतरगच्छ सहस्त्राब्दी महामहोत्सव के प्रेरक , खरतरवसहि के प्रेरक , नमिऊण - लब्धिनिधान तीर्थ के प्रणेता , अजमेर दादाबाड़ी जीर्णोद्धारक, मृदुभाषी , ऋजुमना , सौम्यमूर्ति , युगनायक धर्मशिरोमणि , खरतरगच्छ के वर्तमान पट्टधर परम पूज्य *आचार्य श्री जिन पीयूषसागरसूरीश्वर जी महाराज साहेब नूतन आचार्य श्री जिन सम्यकरत्न सागर सूरीश्वर जी महाराज साहेब* आदि ठाना 5 का आज दिनांक 26/05/2026 को धर्म नगरी धमतरी में गाजे बाजे के साथ संघवी लक्ष्मीलाल लूनिया के निवास स्थान से श्री पार्श्वनाथ जिनालय इतवारी बाजार में भव्य मंगल प्रवेश हुआ। इस अवसर पर बड़ी संख्या में श्रावक श्राविका उपस्थित रहे।
मंगल प्रवेश के समय छोटे छोटे बच्चे वेदांश छाजेड़, रियांश छाजेड़, उदित लुनिया, रिद्धिक बैद, मौली गोलछा, आरवी संचेती रिया गोलछा, प्रिशा गोलछा, आरु स्केटिंग पहनकर गुरु भगवंतों का स्वागत किए तथा साथ चले। महिला मंडल द्वारा मांगलिक कलश से बधाया गया। एवं मनीषा कटारिया द्वारा जिनालय में सुंदर गौली बनाई गई ।
महिला मंडल एवं विमल पारख द्वारा स्वागत गीत प्रस्तुत किया गया। पूनम गोलछा ने अपने विचार रखे। उसके बाद नूतन आचार्य श्री सम्यकरत्न सागर श्री जी महाराज साहेब का प्रवचन हुआ।
परम पूज्य नूतन आचार्य श्री सम्यकरत्न सागर श्री जी महाराज साहेब ने अपने प्रवचन के माध्यम से फरमाया कि अमृत अनुष्ठान के 3 लक्षण है। जिस क्रिया से मन गदगद हो जाये, आँखो में हर्ष के आंसू आ जाए और वाणी रोमांचित हो जाए। जिसके जीवन में ये तीन लक्षण दिखाई दे, तो मान के चलना वो जीव अल्प संसारी है। ये लक्षण अल्प समय में प्राप्त नहीं हो सकता। इस प्रकार के लक्षण जीवन में आए इसके लिए लंबे समय से प्रयास करना पड़ता है। जो भक्त अंतर्भाव से आराधना साधना निरंतर करता है वही शाश्वत सुख को प्राप्त कर सकता है। सार्थक परिणाम प्राप्त करने के लिए सार्थक प्रयास भी करना पड़ता है। एक बार भगवान अपने एक भक्त के पास आकर पूछता है। तुम्हारे पास ये गाड़ी, बंगला, मकान, धन दौलत है ये सब किसका है। भक्त कहता है भगवान ये सब आपका है। आगे बढ़ते बढ़ते भगवान पूजा स्थल पर पहुंच जाते है और फिर भक्त से पूछते है। ये पूजा स्थल किसका है । भक्त फिर कहता है आपका है। उसके बाद प्रतिमा की ओर इशारा करके भगवान फिर पूछते है ये किसका है। भक्त कहता है। ये प्रतिमा मेरी है। भक्त कहता है। भगवान आपकी और मेरी आत्मा एक समान है। बस अंतर इतना है कि आपने अपने कर्मों का नाश कर लिया है और मैं अपने कर्मों के कारण ही इस संसार में अब तक भटक रहा हूँ। इसलिए ये प्रतिमा मेरी है। इस मानव जीवन में हमें जो दुर्लभ समय मिला है उसे आत्म कल्याण के लिए उपयोग करना है। अर्थात वो समय परमात्मा के लिए परमात्मा की तरह बनने के लिए उपयोग करना है। अगर आज हम इस समय का सदुपयोग नहीं कर पाए तो पता नहीं फिर से मानव जीवन कब मिलेगा। हम अपने सांसारिक जीवन में बचे हुए समय का उपयोग धार्मिक कार्यों में करते है। जबकि ज्ञानी भगवंत कहते है हमें धार्मिक कार्यों को प्राथमिकता से करना चाहिए। हमारे पास संसार की सबसे कीमती चीज समय परमात्मा के लिए, धर्म के लिए, गुरु के लिए नहीं है। तो समझ लेना आने वाले भव में मानव जीवन नहीं मिल सकता। संसार की चीजों को अपना मानते है। जड़, जगत के जंजाल से माया कम नहीं होगा। तब तक आत्मा का विकास नहीं हो सकता। परमात्मा का दिया हुआ और उनके लिए ही उपयोग करना ये भाव जब जीवन में आ जाए तो समझ लेना हमारी आत्मा, परमात्मा बनने की प्रक्रिया में आगे बढ़ गई है। जिनवाणी को सुनने से नहीं बल्कि सुनकर सुधरने से आत्मा का विकास हो सकता है। हमें संसार में जो कुछ भी मिला वो पुण्य से मिला। पुण्य धर्म से प्राप्त हुआ। धर्म परमात्मा ने बताया। और उस धर्म को हम तक गुरु भगवंतों ने पहुंचाया। इसलिए देव, गुरु और धर्म का उपकार हमेशा मानना चाहिए। और हमेशा ये कहना चाहिए कि इस संसार में जो कुछ मिला है वो सब आपका है। जिस दिन भक्त के मन में ये भाव आ जाए कि उसे जगत का कुछ भी नहीं चाहिए और जगत का कोई नहीं चाहिए। तो समझ लेना आत्मा के विकास की ओर वह आगे बढ़ चुका है। श्रावकों का कर्तव्य है कि जब भी गुरु भगवंतों का नगर में आगमन हो तब पूरे ठाठबाठ के साथ गुरु भगवंतों का नगर प्रवेश कराकर जिनशासन की शोभा में अभिवृद्धि करे। गुरु भगवंतों के माध्यम से जिनवाणी का श्रवण करते हुए अपनी सुप्तावस्था में रही हुई आत्मा को जगाने का प्रयास करना चाहिए। जो मिला, जितना मिला और जैसा मिला, वो सब परमात्मा का है। यह भाव ही भक्त हृदय की पहचान है। ज्ञानीजन कहते है सम्यक ज्ञान, दर्शन, चारित्र मोक्ष मार्ग का प्रवेश द्वार है। और एक्शन देव,गुरु और धर्म की कृपा से प्राप्त होता है। परमात्मा के प्रति श्रद्धा और समर्पण का भाव ही हमे आगे बढ़ा सकता है। संसार के राग,द्वेष, विषय, कषाय को छोड़कर आत्मा के विकास के मार्ग का चयन करने का प्रयास करना है।
*विहार सेवा ग्रुप का सम्मान*
राजनांदगांव में दिनांक 7 जून 2026 को छत्तीसगढ़ एवं महाकौशल क्षेत्र के लगभग 65 संघों के विहार सेवा ग्रुप के सदस्यों का सम्मान किया जाएगा। इसमें से 55 संघो की स्वीकृति प्राप्त हो चुकी है।
मंगल प्रवेश के कार्यक्रम में जीवनलाल लोढ़ा, अशोक राखेचा, पारसमल गोलछा, लक्ष्मीलाल लूनिया, लूणकरण गोलछा, धरमचंद पारख, प्रकाश पारख, देवीचंद लूनिया, शांति बैद, शिशिर सेठिया, मोहन गोलछा, प्रकाश गोलछा, मोती चोपड़ा, राकेश लूनिया, सुनील लूनिया, विजय बैद, कुशल चोपड़ा, अमित राखेचा, कमल राखेचा, हितेश चोपड़ा, संकेत बरडिया, दर्शन बैद, पारस पारख, मुकेश पारख, पंकज पारख, हीरा बच्छावत, ललित बरडिया, भावेश लूनिया, पृथ्वीराज दुग्गड सहित बड़ी संख्या में समाजजन उपस्थित रहे।
