परम पूज्य उपाध्याय प्रवर अध्यात्मयोगी महेंद्र सागर जी महाराज साहेब परम पूज्य उपाध्याय प्रवर युवामनीषी स्वाध्याय प्रेमी मनीष सागर जी महाराज साहेब के सुशिष्य परम पूज्य प्रशम सागर जी महाराज साहेब परम पूज्य योगवर्धन जी महाराज साहेब श्री पार्श्वनाथ जिनालय इतवारी बाजार धमतरी में विराजमान है। आज दिनांक 7 अगस्त 2025 को परम पूज्य प्रशम सागर जी महाराज साहेब ने प्रवचन के माध्यम से फरमाया कि चातुर्मास काल अपनी गति से आगे बढ़ रहा है। आप और हम सभी धर्म ध्यान से जुड़े हुए है। जिनवाणी का श्रवण करके हमें आत्मा के भेद को समझकर अपने दुख को दूर करना है और सुख की प्राप्ति करना है। आत्मा में कई जन्मों की पाप रूपी बीमारी लगी हुई है यही दुख का कारण है। अब जिनवाणी के माध्यम से उन पापों को आत्मा से निकलना है। सुख अपने आप ही आत्मा को प्राप्त हो जायेगा।
18 पाप स्थानकों में छठवें से दसवें तक का पाप क्रोध, मान, माया, लोभ है। और इन चारों पाप को कषाय कहते है। ज्ञानी कहते है आत्मा का दुख, क्लेश, पीड़ा है कषाय। कषाय आत्मा में रहकर आत्मा को ही दुखी करता है। संसार का सृजन कषाय से होता है। कुछ कषाय शारीरिक तो कुछ मानसिक पीड़ा का कारण बनता है। परमात्मा कहते है पीड़ा से, दुख से और चारों गति से मुक्त होने का एक उपाय है कषाय को छोड़ना अर्थात कषाय से मुक्त होना। जिस दिन हम अपने अंदर से कषाय को निकाल देंगे उस दिन दुख भी निकल जाएगा। ज्ञानी कहते है अगर हमारा जन्ममरण चल रहा है मतलब हम कषाय को छोड़ नहीं पाए है। संसार भ्रमण का कारण ही कषाय है। जब तक कषाय के स्वरूप को हम नहीं समझ पाएंगे तब तक शांति को समझना कठिन है। कषाय अनवरत आत्मा में चलते रहती है। जैसे ही कोई निमित्त मिलता है कषाय दिखाई देने लग जाता है। शरीर में जो भी कष्ट या दुख आता है उसका कारण कषाय ही है। कषाय है तो दुख है और कषाय नहीं है तो सुख है। ज्ञानी कषाय की परिभाषा बताते हुए कहते है।
आत्मा का मैल ही कषाय है। आत्मा का दाग, अपवित्रता ही कषाय है। जो संसार भ्रमण बढ़ाए ऐसे सभी भाव कषाय है। इस आत्मा में हिंसा को वृद्धि करना, भावों की वृद्धि करना , राग में वृद्धि करना ही कषाय है। ऐसा भाव जो स्वयं की आत्मा को पहले दुखी करे उसके बाद सामने वाले को दुखी करे वह कषाय है। संसार के किसी भी पाप का कारण ही कषाय है। जो वर्तमान में हमे अशांत करे साथ ही भविष्य में दुख और दुर्गति का कारण बनता है वहीं कषाय है। कषाय से कर्मों की फसल पैसा होती है और इसी करना संसार भ्रमण बढ़ता है। जो मन को कड़वा कर दे, कसैला कर दे वो कषाय है। कषाय हमारे भावों के साथ साथ अगला भव भी बिगाड़ने वाला है। हमें अपने जीवन से कषाय को निकालना है। कषाय का साम्राज्य हमारी आत्मा में न जाने कब से चल रहा है। अब इस साम्राज्य को नष्ट करने का प्रयास करना है। साथ ही धीरे धीरे आत्मा से कषाय को कम करने का पुरुषार्थ प्रारंभ कर लेना है। कषाय हमारे वास्तविक स्वरूप को कभी न कभी प्रकट कर ही देता है।
परमात्मा कहते है आत्मा में चार तरह से कषाय चल रहा है
अनंतानुबंधी कषाय - अगर हमारी आत्मा में अनंतानुबंधी कषाय चल रहा है तो अनंतकाल तक हमे संसार से मुक्ति नहीं मिल सकती। यह कषाय हमे संसार से निकलने ही नहीं देता। जो आत्मा को अनंतकाल तक संसार में बांधे रखता है वह अनंतानुबंधी कषाय है। हो सकता है यह कषाय हमे कुछ समय के लिए खुश कर दे किंतु अंत में दुख का ही कारण बनता है। क्रोध, मान , माया, लोभ करना पाप है लेकिन इसे अच्छे मानना महापाप है। आत्मा के प्रति रुचि न होना पाप है। पुण्य और पाप के उदय को अच्छा और बुरा मानना अनंतानुबंधी कषाय है। परमात्मा की वाणी के प्रति श्रद्धा न आना अनंतानुबंधी कषाय है।
पुण्य का उदय सुविधा दे सकता है लेकिन सुख भी दे आवश्यक नहीं है। पाप के उदय से दुविधा हो और दुविधा दुख ही दे आवश्यक नहीं है। अगर संसार, शरीर और साधन के प्रति लगाव है तो अनंतानुबंधी कषाय चल रहा है। इसे रोककर ही आत्मा का विकास किया जा सकता है।

