संजय छाजेड़
वर्षों से अपने हाथों की मेहनत और पारंपरिक हुनर से नांगड़ा (ढोल) बनाकर हमारे त्योहारों में उल्लास और ऊर्जा भरने वाली हमारी दीदी से मिलना सचमुच भावुक कर देने वाला क्षण था। जिन हाथों की थाप पर पूरा शहर झूमता है, वही हाथ आज सादगी से अपनी रोज़ी-रोटी के लिए बाजार में खड़े थे। उनके चेहरे की रौनक में संघर्ष की कहानी भी थी, आत्मसम्मान की चमक भी और आत्मनिर्भरता का गर्व भी।*
*हमारे त्योहार केवल रंगों से नहीं, बल्कि ऐसे ही मेहनतकश परिवारों की तपस्या से रोशन होते हैं। ये कारीगर हमारी संस्कृति के सच्चे संरक्षक हैं। इनके श्रम का सम्मान करना, इनके जीवन में स्थायित्व और सुरक्षा लाना हम सबकी जिम्मेदारी है।
होली की असली खुशबू इन मेहनती हाथों की मिट्टी में है, और असली रंग इन मुस्कुराते चेहरों में।
आप सभी को रंग, उमंग और समृद्धि से भरी होली की हार्दिक शुभकामनाएँ।
