राष्ट्रपति का अपमान आदिवासी समाज कतई बर्दाश्त नही करेग

धमतरिहा के गोठ
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संजय छाजेड़ 
गोंडवाना गोंड महासभा छत्तीसगढ़ द्वारा 07 मार्च को पश्चिम बंगाल में आयोजित 9वें अंतरराष्ट्रीय संथाल सम्मेलन के दौरान राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के साथ हुए अपमान कि घोर निंदा किए हैं। महासभा के प्रदेश अध्यक्ष एवं विधायक केशकाल नीलकंठ टेकाम ने कहा कि ममता बनर्जी का यह कृत्य न केवल अशिष्ट आचरण की पराकाष्ठा है, बल्कि हमारे देश के लोकतांत्रिक मूल्यों और संवैधानिक मर्यादाओं की हत्या है। भारत की प्रथम नागरिक राष्ट्रपति श्रीमती मुर्मू का जिस तरह से बंगाल की ममता सरकार ने अनादर किया है, उसने देश के हर आदिवासी और नारी का सिर शर्म से झुका दिया है। श्री टेकाम ने कहा कि प. बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को इस अपमानजनक व्यवहार के लिए राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू एवं पूरे आदिवासी समाज और देशभऱ की मातृशक्ति से सार्वजनिक रूप से माफी मांगनी चाहिए।
 श्री टेकाम जी ने कहा कि यह भारत के इतिहास में शायद पहली बार हुआ है कि देश की राष्ट्रपति किसी राज्य के दौरे पर हों और न तो वहां की मुख्यमंत्री और न ही कोई वरिष्ठ मंत्री उनके स्वागत के लिए उपस्थित हों। यह केवल एक प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि राष्ट्रपति पद और संविधान का जानबूझकर किया गया अपमान है। श्री टेकाम ने सवाल किया कि पहले से तय सिलीगुड़ी के 'बिधाननगर' जैसे सुलभ स्थल को अंतिम समय में बदलकर बागडोंगरा के 'गोसाईंनपुर' जैसे दुर्गम और छोटे स्थान पर क्यों ले जाया गया? क्या ममता सरकार डर गई थी कि राष्ट्रपति को सुनने के लिए उमड़ने वाला आदिवासियों का सैलाब उनकी सत्ता हिला देगा? स्वयं महामहिम को सार्वजनिक मंच से कहना पड़ा, “यदि स्थान बड़ा होता, तो अधिक आदिवासी लोग शामिल हो पाते।” ममता बनर्जी ने अपनी राजनीतिक ईर्ष्या के कारण हजारों आदिवासी भाई-बहनों को राष्ट्रपति के संबोधन से वंचित कर दिया। श्री टेकाम जी ने कहा कि भारत के इतिहास में पहली बार एक आदिवासी महिला इस सर्वोच्च पद पर आसीन हुई हैं। ममता बनर्जी खुद को महिलाओं की हितैषी बताती हैं, लेकिन एक आदिवासी महिला राष्ट्रपति का स्वागत न करना उनकी 'संकीर्ण मानसिकता' और 'दलित-आदिवासी विरोधी' चेहरे को उजागर करता है। ममता बनर्जी ने बंगाल में लोकतंत्र को पहले ही समाप्त कर दिया है, और अब वे संवैधानिक संस्थाओं को भी चुनौती दे रही हैं। राष्ट्रपति का पद दलगत राजनीति से ऊपर होता है, लेकिन बंगाल सरकार ने इसे अपनी तुच्छ राजनीति का अखाड़ा बना दिया है। श्री टेकाम ने कहा कि ममता सरकार स्पष्ट करे कि राष्ट्रपति के स्वागत के लिए प्रोटोकॉल का पालन क्यों नहीं किया गया? कार्यक्रम स्थल को अंतिम क्षणों में दुर्गम स्थान पर स्थानांतरित करने के पीछे किसका हाथ था? श्री टेकाम ने कहा कि देश का आदिवासी समाज जाग चुका है। हम अपनी बेटी और देश की राष्ट्रपति का अपमान बर्दाश्त नहीं करेंगे। यदि सार्वजनिक माफी नहीं मांगी गई, तो इसका करारा जवाब लोकतांत्रिक तरीके से दिया जाएगा।

 श्री टेकाम जी ने कहा कि ममता बनर्जी द्वारा बंगाल में राष्ट्रपति को रिसीव न करना एक सोची-समझी रणनीति लगती है। यह समझना होगा कि द्रौपदी मुर्मू केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि करोड़ों आदिवासियों और महिलाओं की प्रेरणा हैं। उनका अपमान भारत की लोकतांत्रिक जड़ों को खोखला करने जैसा है।
ममता बनर्जी सरकार के इस कृत्य की निंदा करने वालों में प्रमुख महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष एस पी शोरी, राष्ट्रीय महासचिव लोकेंद्र सिंह, संरक्षक बी पी एस नेताम, प्रदेश महासचिव आर एन ध्रुव, प्रदेश उपाध्यक्ष चंद्रिका प्रसाद ठाकुर, डॉ. शंकर लाल उइके ,अंबिका प्रसाद शांडिल्य, बलदाऊ ध्रुव , प्रांतीय कोषाध्यक्ष फूल सिंह नेताम ,प्रदेश संगठन मंत्री डॉ एल एस ध्रुव , संयुक्त सचिव विजय कौशिक, जागेश्वर नेताम, भुवनेश्वर सिदार, प्रदेश अध्यक्ष महिला प्रभाग श्रीमती बसंता ठाकुर, प्रदेश अध्यक्ष युवा प्रभाग चेमसिंह मरकाम, मीडिया प्रभारी रोहित कुमार मरकाम, जीवराखन लाल उसारे, शिवचरण नेताम, सुदर्शन ठाकुर, हूलार सिंह कोर्राम प्रमुख हैं।

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