पाँच वर्ष बाद भी न्याय अधूरा: डूबान की पीड़ा अब विधानसभा के दरवाज़े पर

धमतरिहा के गोठ
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संजय छाजेड़ 
गंगरेल बाँध के डूबान प्रभावित परिवारों का धैर्य अब अपनी अंतिम सीमा पर पहुँच चुका है। जिन लोगों ने विकास के नाम पर अपनी ज़मीन, घर और आजीविका छोड़ी, वे आज भी अपने ही अधिकार के लिए दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर हैं।
माननीय छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने स्पष्ट आदेश दिए थे कि पात्र प्रभावितों को समानता के आधार पर भूमि आवंटन सुनिश्चित किया जाए। किंतु आदेश पारित हुए पाँच वर्ष बीत जाने के बाद भी यदि ज़मीन पर न्याय दिखाई नहीं देता, तो यह केवल प्रशासनिक विलंब नहीं, बल्कि संवेदनहीनता का प्रतीक बन जाता है।
23 फरवरी 2026 से गांधी मैदान, धमतरी में जारी अनिश्चितकालीन धरना अब एक औपचारिक विरोध नहीं, बल्कि अस्तित्व की लड़ाई का स्वर है। जिन परिवारों को आरक्षित भूमि पर बसाया जाना था, वे आज भी भूमिहीन हैं। सवाल सीधा है—जब भूमि उपलब्ध है और आदेश स्पष्ट है, तो फिर पुनर्वास क्यों लंबित है?
इसी पीड़ा और प्रश्न को लेकर डूबान प्रभावितों ने लोकतांत्रिक मार्ग चुनते हुए धमतरी से नवा रायपुर स्थित छत्तीसगढ़ विधानसभा तक पैदल मार्च का निर्णय लिया है। 25 फरवरी को प्रारंभ होकर 27 फरवरी को विधानसभा घेराव तक पहुँचने वाला यह मार्च केवल कदमों की यात्रा नहीं, बल्कि वर्षों के इंतज़ार, संघर्ष और न्याय की पुकार की यात्रा है।

यह आंदोलन अहिंसात्मक होगा, अनुशासित होगा, संवैधानिक होगा—परंतु मौन नहीं होगा। लोकतंत्र में यदि न्यायालय के आदेश भी प्रभावी न हों, तो जनता का सड़क पर उतरना व्यवस्था के लिए चेतावनी है।

डूबान संघर्ष समिति ने प्रशासन से अनुमति की मांग की है और स्पष्ट किया है कि मांगों के समाधान तक गांधी मैदान, धमतरी में अनिश्चितकालीन धरना जारी रहेगा।
अब निर्णय शासन के हाथ में है—क्या न्याय फाइलों में बंद रहेगा, या ज़मीन पर उतरकर प्रभावित परिवारों को उनका अधिकार दिलाएगा?

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