भगवान महावीर का शासन अनुशासित था अतः हमे भी अनुशासित रहना चाहिए- परम पूज्य लयस्मिता श्री जी म. सा.

धमतरिहा के गोठ
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संजय जैन 

आज प्रवचन प्रारंभ करने से पूर्व श्री नथमल जी घेवरचंद जी संकलेचा परिवार द्वारा परम पूज्य म.सा. को उपासक दशांग सूत्र बोहराया गया उसके बाद 5 ज्ञान की पूजा की गई। 
आज के प्रवचन में परम पूज्य लयस्मिता श्री जी म. सा. ने फरमाया कि इस सूत्र में श्रावक धर्म का वर्णन है। भगवान महावीर का शासन अनुशासित था अतः हमे भी अनुशासित रहना चाहिए। इस सूत्र से यही सीखने का प्रयास करना है। 

उपासक दशांग सूत्र तीन  शब्दों से बना है।
उपासक - अर्थात परमात्मा की उपासना करने वाला ।
दशांग - अर्थात दस श्रावक
सूत्र - अर्थात आगम
ऐसा आगम जिसमे परमात्मा की उपासना करने वाले श्रावको का वर्णन है उस आगम का नाम है  उपासक दशांग सूत्र। जैन दर्शन में श्रावको को रीड की हड्डी जैसा बताया गया है। एक पक्का श्रावक हर जगह आदरणीय और पूज्यनीय होता है।
चार प्रकार की वाणी होती है।
 आप्तवाणी - जिन्होंने अपनी आत्मा से ज्ञान प्राप्त किया है और उसे बताया है वह आप्तवाणी है।
प्राप्तवानी - जो ज्ञान बाहर से सुनकर या पढ़कर प्राप्त किया है वह प्राप्तवाणी है।

शुतज्ञान - गौतम स्वामी ने भगवान महावीर से सुनकर उसे गूंथने का अर्थात आगम की रचना की यह श्रुतज्ञान है।
शास्त्रज्ञान -  आचार्य भगवान अपने शिष्यों को अनुशासित रखने के लिए जो ज्ञान बताते है वह शास्त्रज्ञान कहलाता है। 10श्रावको का भगवान के प्रति पूर्ण समर्पण का भाव होने के कारण ये सभी भगवान महावीर के प्रमुख श्रावक कहलाते है। 


सभी प्रमुख श्रावक अत्यंत धनाढ्य परिवार से थे। पहले के समय में जिस परिवार के पास जितना अधिक गाय होता था वह परिवार उतना अधिक धनाढ्य माना जाता था। 
परम पूज्य अमिवर्षा श्री जी म.सा.ने अपने प्रवचन में कहा कि आज सावन का दूसरा दिन है। दूज के चांद और पूनम के चांद में दूज का चांद बड़ा माना जाता है क्योंकि वह धीरे धीरे बढ़ते बढ़ते पूर्णिमा तक पहुंचता है। हमे भी दूज के चांद के जैसे बनना है। आज जिस ज्ञान की हम पूजा कर रहे है उसका उद्देश्य यही है की हम भी धीरे धीरे ही सही पर ज्ञान हमे जरूर प्राप्त हो।
जैन दर्शन के अनुसार अनंत भाव्यत्माओ ने वंदन करते हुए आत्म कल्याण कर लिया। जैसे एक नदी और एक नाला होता है। दोनो में जल और कचरा होता है । किंतु नदी बहते बहते अपने कचरे को किनारे करके स्वच्छ हो जाता है जबकि नाला का जल एक स्थान पर रहने के कारण कचरा उसमे और बढ़ जाता है। हमे भी नदी के जल के जैसे बनना है। हमे चातुर्मास यही प्रेरणा देने आया है की हम भी लक्ष्य का निर्धारण करके आगे बढ़ते रहना है।औरजीवन का उद्धार करना है।




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