कांग्रेस, भाजपा दोनों ही दल गुटबाजी के रोग से ग्रसित

धमतरिहा के गोठ
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संजय जैन 

धमतरी । आगामी महीने होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर जिले के राजनीतिक दल के नेताओं द्वारा अपनी-अपनी ढपली, अपना-अपना राग अलापते हुए यह दावा किया जा रहा है कि हम जिले की तीनों सीटों को हासिल करने में कामयाब रहेंगे परंतु यह कटु सत्य है कि दावा करना और काम करके दिखाया जाना अलग-अलग पहलू है जिसे नजरअंदाज कर नेताओं द्वारा सिवाय अपनी वाहवाही लूटने के, कुर्सी तोडऩे के, जमीनी कार्यकर्ताओं से ये नेता कोसों दूर हैं। राजनीतिक पार्टी के नेताओं को यह शायद नहीं मालूम है कि उनके कार्यकर्ता भले ही वो उनके समक्ष हाजिर होकर भीड़ बढ़ाने में कामयाब होते हैं, परंतु वास्तविकता बिल्कुल इसके विपरीत है। पिछले दिनों महिला कांग्रेस की अध्यक्ष द्वारा कार्यकारिणी की घोषणा की गई है उसमें भी असंतोष के स्वर उभरने लगे हैं। इधर भाजपा में भी अंदर ही अंदर कार्यकर्ताओं में असंतोष व्याप्त है जिसके चलते यह कहा जा सकता है कि चुनाव में दोनों प्रमुख पार्टियों के लिये यह पहलू विचारणीय है। दोनों ही प्रमुख राजनीतिक दल गुटबाजी के रोग से ग्रसित नजर आ रहे हैं।

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थानीय इकाई के वरिष्ठ पदों पर बैठे नेताओं द्वारा सिर्फ और सिर्फ अपना ही कार्य किया जा रहा है। कार्यकर्ताओं की इन्हें कोई परवाह नहीं है। प्रदेश के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल द्वारा जितनी जनकल्याणकारी योजनाएं चलाई जा रही हैं, न तो उसका प्रचार-प्रसार किया जा रहा है और न ही इस बात की जानकारी कार्यकर्ताओं को दिये जाने हेतु कोई बैठक का सहारा नहीं लिया जा रहा है। और तो और प्रदेश संगठन द्वारा निर्धारित जयंती, पुण्यतिथि के अवसरों पर होने वाली बैठक पर भी विराम लग चुका है। ऐसी बैठकों के आयोजन को लेकर कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं का ऐसा मानना था कि ऐसी बैठकें होने से कार्यकर्ताओं में नई स्फूर्ति का संचार होगा। लेकिन वरिष्ठ नेताओं के उक्त आदेश का पालन न करते हुए ऐसी बैैठकें आयोजित नहीं की जा रही है। हां, यह जरूर है कि डोर-टू-डोर जनसंपर्क अभियान के नाम पर खानापूर्ति की जा रही है। पिछले दिनों महिला संगठन के जिलाध्यक्ष द्वारा जो सूची शहर कांग्रेस कमेटी की बनाई गई है, उसमें भी पूर्व में भाजपा सदस्य रहे नेताओं को शामिल किया गया है। कुछ महिलाओं को उनकी इच्छा के अनुसार पद भी नहीं दिया गया है। इस प्रक्रिया में वर्षों से जुड़ी कांग्रेस की कर्मठ कार्यकर्ताओं की भी अनदेखी की गई है जिसे लेकर शहर में व्यापक चर्चा है।

जिले में कांग्रेस के नेताओं को जो जिम्मेदारी दी गई है, उससे वे विमुख होकर कार्य कर रहे हैं। साढ़े चार साल गुजर गये, इन नेताओं ने धमतरी के 40 वार्डों में कभी भी अपनी उपस्थिति दर्ज नहीं कराई है। इनका ऐसा कहना है कि जिनको जिम्मेदारी दी गई है, उनके द्वारा वार्डों में जाकर शासन की योजनाओं को पहुंचाने की जिम्मेदारी है। उनकी इस दलील का कुछ कार्यकर्ताओं ने नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया कि वे ऐसा कहकर बैठकों में भी रूचि नहीं रखते। आनन-फानन में जो भी कार्य हो, उसकी प्रेस विज्ञप्ति जारी कर अपने आप को प्रचारित करने और निजी कार्य को बढ़ावा देने का कार्य कर रहे हैं। यही वजह है कि नेताओं की लापरवाही के चलते कांग्रेस के लिये तीनों सीट जीतना असंभव सा प्रतीत होता है। भाजपा के राष्ट्रीय एवं प्रदेश स्तर के नेताओं के समक्ष कांग्रेस की महिला नेत्रियों, नेताओं ने जिस प्रकार भाजपा प्रवेश किया है, उससे साफ जाहिर है कि कांग्रेस के लिये आने वाला समय काफी निराशाजनक रहेगा और धमतरी की तीनों विधानसभा सीट जीतने का इनका चूर होगा। इसे लेकर अनेकों बार वरिष्ठ नेताओं को भी अवगत करा दिया गया है। लेकिन इन नेताओं ने भी इस गंभीर मुद्दे पर ध्यान नहीं दिया। प्रदेश के मंत्री भी इन नेताओं के ईशारे पर जैसा ये कहते हैं, वैसा करते हैं और चार चिन्हारी की ईर्दगिर्द पहुंचकर फूल माला पहनकर कार्यकर्ताओं की उपेक्षा कर ये अपने गंतव्य को रवाना हो जाते हैं। इससे भी जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं में भारी नाराजगी देखी जा रही है। यह सीधी बात है कि जब जमीनी कार्यकर्ता ही अपने वरिष्ठ नेताओं से नाराज होगा तो ऐसे में कैसे कहा जा सकता है कि ये कार्यकर्ता आने वाले चुनाव में कांग्रेस के पदचिन्ह पर कार्य करेंगे।

विधानसभा चुनाव को लेकर जहां शहर महिला कांग्रेस की नियुक्ति को लेकर जो बातें पता चल रही हैं, और जो नाराजगी है, उससे संगठन कमजोर दिखाई दे रहा है। कुछ इसी तरह का हाल भाजपा का भी है जिनके नेताओं द्वारा समन्वय स्थापित करने के लिये बारंबार बैठकें आयोजित की गई है। पुरानी कृषि उपज मंडी में भी विशाल सम्मेलन हुआ है जिसमें जिले के लगभग 1 हजार लोगों ने कांग्रेस छोडक़र भाजपा प्रवेश किया है किंतु ऐसा कर लेने से काम नहीं चलेगा जबकि धमतरी जिले के नेताओं द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 9 वर्षीय कार्यकाल को प्रचारित किया जा रहा है और तीनों विधानसभा सीट जीतने का दावा किया जा रहा है किंतु भीतरी असंतोष जो जनसंघ के समय से अब तक पार्टी के लिये काम कर रहे हैं उनकी उपेक्षा लगातार चर्चा का विषय बनी हुई है। पिछले साढ़े चार साल में जब कांग्रेस की सत्ता प्रदेश में स्थापित हुई, उस समय से लेकर अभी तक भाजपा के नेताओं की बीच चौराहों में लड़ाई, वाद-विवाद, निष्कासन, आरोप-प्रत्यारोप का दौर चलता रहा है। आज भी भाजपा संगठन में तालमेल का अभाव देखा जा रहा है। इसे देखते हुए यह माना जा रहा है कि यह भाजपा के लिये नुकसानदेह साबित हो सकता है। भाजपा नेताओं के द्वारा चुनाव को लेकर जितना प्रचार-प्रसार किया जाना था वह नहीं किया जा रहा है। इससे भी पार्टी को नुकसान हो सकता है। हालांकि अभी चुनाव में 70 दिन बाकी हैं, और इन नेताओं के बीच तालमेल बनाया जाना अति आवश्यक है। अब देखना है कि प्रदेश में बैठे संगठन के नेता इस अंदरूनी लड़ाई और नियुक्ति, लापरवाही को लेकर क्या कदम उठाते हैं? कुल मिलाकर जिले की राजनीति पर दोनों प्रमुख दलों की स्थिति को देखने पर यह नजर आता है कि किसी समय कांग्रेस में महिलाओं की संख्या काफी अधिक नजर आती थी, वर्तमान में महिलाएं लगातार पार्टी से दूर होती नजर आ रही हैं। उसका प्रमुख कारण कांग्रेस महिला मोर्चा अध्यक्ष की एकला चलो.. नीति को बताया जा रहा है। वहीं भाजपा में भी कमोवेश यही स्थिति नजर आ रही है। नये महिला मोर्चा जिलाध्यक्ष पद की नियुक्ति के समय जिले के पदाधिकारियों की बिना रायशुमारी के नियुक्ति को लेकर भाजपा में अंदर ही अंदर घमासान मचा हुआ है।

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