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| फाइल फोटो |
संजय जैन
शासन द्वारा आमजनों के उत्थानार्थ हेतु अनेक जनकल्याणकारी योजनाएं प्रदेश में चलाई जा रही है। लेकिन इन जनकल्याणकारी योजनाओं के देखरेख के अभाव में जिस प्रकार लापरवाही दिखाई दे रही है, उसे लेकर अनेक लोगों ने जिला स्तर के संबंधित अधिकारियों पर दोषारोपण करते हुए ऐसे अधिकारियों के विरूद्ध कार्यवाही की मांग की है। शासन की इस योजना में एक योजना यह भी शामिल थी कि आदिवासियों के विकास एवं उनके उत्थानार्थ हेतु उन्हें जीविकोपार्जन के लिये शासकीय भूमि आबंटित की जाये और ऐसा किया भी गया। पूर्ववर्ती सरकार के द्वारा भी आदिवासियों को शासकीय भूमि आबंटित की गई। अभी भी नगरी, सिहावा क्षेत्र में ऐसे भूमिहीन व्यक्तियों को शासकीय भूमि का पट्टा दिये जाने हेतु कार्यवाही जारी है। लेकिन ऐसी भूमियों को लेकर आदिवासी समाज के कुछ लोगों द्वारा भूमाफियाओं के साथ मिलीभगत कर उसे बेचने का भी कुचक्र चलाया जा रहा है जिसके तहत गंगरेल, मरादेव, ओजस्वी नर्सिंग होम, नवागांव आदि क्षेत्र में जो भूमि आदिवासियों, कोटवारों को दी गई थी, ऐसी भूमि का भी क्रय-विक्रय कर दिया गया है जिसे लेकर अब तक कोई जांच नहीं होने से भूमाफियाओं के हौसले बुलंद हैं।
आजादी के बाद से जो भी सरकारें रही है, वो आदिवासियों के उत्थानार्थ एवं उनके जीवन यापन के स्तर को सुधारने के लिये कार्य करते आ रही है। इसे लेकर समय-समय पर चिंतन-मंथन भी किया जाता है। वर्ष 1980 में भी अविभाजित मध्यप्रदेश के समय भूमिहीन आदिवासियों को ग्राम मरादेव में शासकीय वन एवं राजस्व भूमि का आबंटन किया गया था जिसमें आज भी कुछ लोग काबिज हैं और इनमें से कुछ लोगों ने अपनी शासकीय भूमि को विभिन्न व्यक्तियों को विक्रय कर दिया है। ऐसी भूमियों को माफिया के लोग खरीदकर वहां आलीशान मकान एवं रिसॉर्ट सेंटर बनाकर आज भी ऐश कर रहे हैं। हद तो यह है कि आदिवासियों की भूमि बिना जिला प्रशासन की अनुमति कोई व्यक्ति सीधे नहीं खरीद सकता किंतु लोक निर्माण विभाग में पदस्थ एक अधिकारी के द्वारा भी उक्त भूमि को खरीदकर वहां रिसॉट बना दिया गया है। हालांकि वन मंडल अधिकारी मयंक पांडे इसकी शिकायत मिलने पर उन्होंने उक्त भूमि का सीमांकन कराया और अतिक्रमित वनभूमि पर कब्जा को हटाया। इसी तरह ओजस्वी नर्सिंग होम के पास शासन द्वारा कोटवार को जीविकोपार्जन के लिये दी गई भूमि की भी खरीदी-बिक्री हो चुकी है। जीविकोपार्जन के लिये आदिवासियों, कोटवारों को दी गई भूमि आज किस स्तर पर है, कितने ऐसे लोगों ने जमीन खरीदी, इसकी कोई जानकारी जिला प्रशासन के पास नहीं है। आज ऐसे ही जमीन विक्रय किये लोग पुन: शासकीय भूमि की मांग कर रहे हैं।
मिली जानकारी के अनुसार पता चला है कि धमतरी के वन बाहुल्य क्षेत्रों में भी ऐसे लोगों का दबदबा जारी है और वे कुछ अधिकारियों से सांठगांठ कर ऐसी भूमियों को अतिक्रमित कर रहे हैं जिसमें वन सुरक्षा समिति के लोग भी शामिल हैं। वन सुरक्षा समिति के लोगों द्वारा बाहरी व्यक्तियों को बुलाकर वहां बसाया जा रहा है जबकि दूसरी ओर स्थानीय भूमिहीन व्यक्तियों को भूमि आबंटन से वंचित किया जा रहा है जिसकी शिकायत भी वन मंडलाधिकारी धमतरी को प्रेषित की गई है। हद तो यह है कि धमतरी वन परिक्षेत्रांतर्गत ग्राम मथुराडीह में चांदा-मुनारा को तोडक़र वहां एक व्यक्ति को मुर्गी फार्म बनाने के लिये पूरी छूट दी गई। तुर्रा यह कि वनक्षेत्र की मुरूम को पहुंचमार्ग बनाने तक मदद दी गई। इसमें चांदा-मुनारा को भी अधिकारियों के निर्देश पर तोडफ़ोड़ कर दिया गया है जिसकी शिकायत भी प्रदेश के वनमंत्री को प्रेषित की गई है। इस प्रकरण में वन मंडलाधिकारी मयंक पांडे ने वनरक्षक, बीटगार्ड को निलंबित किया है। लेकिन जिन अधिकारियों ने मुर्गी फार्म बनाने चांदा-मुनारा तोड़ा, साथ ही मुर्गी फार्म बनाने वाले को वनक्षेत्र की भूमि से मुरूम निकालकर कच्चा मुरूमी रोड बनाने में मदद की, ऐसे लोगों पर शिकायत के बाद भी कोई कार्यवाही नहीं होना अनेक शिकायतों को जन्म देता है। ऐसे शासकीय भूमि को भी भूमाफियाओं जैसे लोग अपना नाम चढ़ाने, क्रय विक्रय करने से गुरेज नहीं कर रहे हें।
बताया जाता है कि आदिवासियों को जो भूमि जीविकोपार्जन के लिये मरादेव में दी गई थी, उस भूमि का पूरी तरह लेनदेन गैर आदिवासी के मध्य कर दिया गया है। इसी मध्यस्थता करने वाले तथाकथित तीन व्यक्ति मरादेव में आज भी ऐसी भूमियों पर गिद्ध दृष्टि जमाये उन आदिवासी परिवारों से उनकी कब्जे की भूमि को खरीदने के लिये लालच दे रहे हें जबकि इसी क्षेत्र में एक अधिकारी द्वारा रेस्ट हाउस बनाकर वहां ऐशबाजी की जा रही है जबकि यह भूमि भी पूर्व में आदिवासी की ही थी जिसकी लिखापढ़ी अभी तक नहीं हो पाई है। खबर है कि इस भूमि को गैर आदिवासी को बेचने के लिये कलेक्टर से अनुमति प्राप्त करने के लिये प्रयास किया जा रहा है। अब देखना है कि शासन की इस योजना को जिन लोगों ने दुधारू गाय की तरह दोहन किया है, ऐसे लोगों पर जिला प्रशासन किस प्रकार कार्यवाही करता है। ज्ञातव्य रहे कि कोटवार की ओजस्वी नर्सिंग होम के समीप स्थित भूमि को भी धड़ल्ले से क्रय-विक्रय कर उसमें भवन निर्माण कर लिया गया है।


