कुरुद सहित अंचल में धूमधाम के साथ मनाया गया अक्ती का महापर्व

धमतरिहा के गोठ
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संजय जैन      

धमतरी | शनिवार को कुरुद नगर सहित ग्रामीण अंचल में छत्तीसगढ की लोकसंस्कृति का महापर्व अक्ती  हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। सुबह से ही पर्व के प्रति विशेष उत्साह देखने को मिला। छोटे-छोटे बच्चों ने घरों में मिट्टी के गुड्डे.गुडिया (पुतरी.पुतरा) की शादी पूर्ण रीति.रिवाज के साथ संपन्न की गई ।मनमोहक मंडप सजाकर आकर्षक रूप में पुतरी.पुतरा को सजाया गया।

 छत्तीसगढ में प्रतिवर्ष अक्ती पर्व हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। अक्षय का अर्थ है,कभी न मिटने वाला, कभी न खत्म होने वाला। इसलिए इस दिन जो भी कार्य किया जाता है वह फलदाई होता है। इस दिन को इतना पवित्र माना जाता है कि अक्षय तृतीया के दिन कोई भी मांगलिक कार्य किया जा सकता है। ग्रामीण अंचल में इस दिन किसानों का नया त्योहार अक्ति ठाकुर देव में दोना चढाते हैं और बचे हुए आधा धान को घर लाकर क्षेत्रों के एक छोर में बोनी करते हैं। इसी दिन से ही किसानी का पर्व प्रारंभ होता है। अक्ती मुहूर्त में विवाहों की धूम रहती है।

          गांव- गांव में मुहरी एवं दफडा बाजा की जुगलबंदी सुनाई दे जाती है। इसके साथ गुड्डे.गुढिया के विवाह की धूम रहती है।  अक्ति माने अक्षय तृतीया, यह बैशाख मास शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाया जाने वाला त्योहार है। पर्व को मनाने के पीछे कई प्राचीन मान्यताएं हैं। मान्यता है कि इस दिन भगवान ब्रह्मा के पुत्र अक्षय कुमार का जन्म हुआ था, भगवान विष्णु के दशावतारों में से एक भगवान परशुराम का जन्म दिवस माना जाता है। अक्षय तृतीया के दिन ही सतयुग का प्रारंभ माना जाता है।

          छत्तीसगढ के ग्रामीण अंचल में प्रमुख देवता ठाकुर देवता को माना जाता है। वैसे तो अन्य त्योहारों में भी ठाकुर देवता की पूजा की जाती है परंतु अक्ती के दिन विशेष पूजा की जाती है। इस दिन सभी किसान पलाश के पत्ते के दोने में धान लेकर गांव के बैगा के साथ ठाकुर देवता में पहुंचते हैं। परसाद के लिए महुआ, गेहूं, लाखडी या अन्य धान्य के साथ चीला रोटी भी बना कर ले जाते हैं। यहां पहुंच कर सभी के दोने के धान को मिला दिया जाता है और बैगा द्वारा सभी किसानों के धान को इकठ्ठा कर भगत द्वारा विधिवत पूजा पाठ की जाती है।

 


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