सुहागिनो ने पति की दीर्घायु के लिए रखा वट सावित्री व्रत

धमतरिहा के गोठ
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संजय जैन 

धमतरी। ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की अमावस्या को वट पूर्णिमा व्रत किया जाता है। सुहागन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु के लिए यह व्रत रखती हैं। कहा जाता है कि इस दिन सावित्री अपने पति सत्यवान के प्राण यमराज से वापस लेकर आईं थीं। जिसके बाद उन्हें सती सावित्री कहा जाने लगा। इस साल वट सावित्री व्रत 19 मई  को मनाया जा रहा है। आज वट सावित्री के अवसर पर सुहागिनो  ने पति की दीर्घायु की कामना करते हुए व्रत रखा और वट वृक्ष की विधिवत पूजा अर्चना कर पति की दीर्घायु की कामना की। सुहागन स्त्रियां वट सावित्री व्रत के दिन सोलह श्रृंगार करके सिंदूर, रोली, फूल, अक्षत, चना, आम फल और मिठाई से वट वृक्ष की पूजा कर सावित्री, सत्यवान और यमराज की कथा श्रवण कर पूजा कियेे तत्पश्चात वट वृक्ष की जड़ को दूध और जल चढ़ाये इसके बाद कच्चे सूत को हल्दी में रंगकर वट वृक्ष में लपेटते हुए परिक्रमा किये।

यह व्रत रखने के पीछे एक किंवदती है कि बहुत पहले की बात है अश्वपति नाम का एक सच्चा ईमानदार राजा था। उसकी सावित्री नाम की बेटी थी। जब सावित्री शादी के योग्य हुई तो उसकी मुलाकात सत्यवान से हुई। सत्यवान की कुंडली में सिर्फ  एक वर्ष का ही जीवन शेष था। सावित्री पति के साथ बरगद के पेड़ के नीचे बैठी थी। सावित्री की गोद में सिर रखकर सत्यवान लेटे हुए थे। तभी उनके प्राण लेने के लिये यमलोक से यमराज के दूत आये पर सावित्री ने अपने पति के प्राण नहीं ले जाने दिए। तब यमराज खुद सत्यवान के प्राण लेने के लिए आते हैं। सावित्री के मना करने पर यमराज उसे वरदान मांगने को कहते हैं। सावित्री वरदान में अपने सास-ससुर की सुख शांति मांगती है। यमराज उसे दे देते हैं पर सावित्री यमराज का पीछा नहीं छोड़ती है। यमराज फिर से उसे वरदान मांगने को कहते हैं। सावित्री अपने माता पिता की सुख समृद्धि मांगती है। यमराज तथास्तु बोल कर आगे बढ़ते हैं पर सावित्री फिर भी उनका पीछा नहीं छोड़ती है। यमराज उसे आखिरी वरदान मांगने को कहते हैं तो सावित्री वरदान में एक पुत्र मांगती है। यमराज जब आगे बढऩे लगते हैं तो सावित्री कहती हैं कि पति के बिना मैं कैसे पुत्र प्राप्ति कर सकती हूं। इसपर यमराज उसकी लगन, बुद्धिमत्ता देखकर प्रसन्न हो जाते हैं और उसके पति के प्राण वापस कर देते हैं।  

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